देश की राजधानी दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में रहने वाले 3 करोड़ से अधिक नागरिकों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और दैनिक जीवन से जुड़ी आज की सबसे खतरनाक और चिंताजनक सामाजिक-स्वास्थ्य खबर सामने आई है। जाड़ों की शुरुआत के साथ ही दिल्ली-एनसीआर की हवा एक बार फिर अत्यधिक जहरीली हो गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली का औसतन वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 380 के आंकड़े को पार कर 'बेहद खराब' (Very Poor) और कई संवेदनशील इलाकों में 'गभीर' (Severe) श्रेणी में पहुँच चुका है।
राजधानी के वायुमंडल में छाई जहरीली धुंध (Smog) और पीएम 2.5 व पीएम 10 कणों की भयावह सांद्रता को देखते हुए, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने पूरे दिल्ली-एनसीआर में 'ग्रैडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान' के दूसरे चरण यानी 'ग्रेप-2' (GRAP Stage II) के सख्त प्रतिबंधों को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है। इसके तहत पूरे क्षेत्र में तंदूरों में कोयला और लकड़ी जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है, डीजल जनरेटर के उपयोग पर कड़ी शर्तें लागू कर दी गई हैं, और निर्माण व तोड़फोड़ स्थलों पर धूल-नियंत्रण उपायों को न मानने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोकने का आदेश जारी हुआ है।
भारतीय सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य परिप्रेक्ष्य में हर साल नवंबर की शुरुआत में आने वाली यह 'मेडिकल इमरजेंसी' राजधानी के बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और अस्थमा व हृदय रोगियों के जीवन के लिए सीधा खतरा बन जाती है। डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस जहरीली हवा में बिना मास्क के बाहर निकलना रोजाना 15 से 20 सिगरेट पीने के बराबर फेफड़ों को नुकसान पहुँचा रहा है। अस्पतालों की ओपीडी में सांस की तकलीफ, आँखों में जलन और एलर्जी के मरीजों की संख्या में 40% की अचानक वृद्धि दर्ज की गई है।
प्रशासनिक मोर्चे पर, दिल्ली सरकार और पुलिस ने सड़कों पर रोजाना पानी और एंटी-स्मॉग गन से छिड़काव करने के निर्देश दिए हैं। ट्रैफिक जाम से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रमुख चौराहों पर पार्किंग फीस बढ़ा दी गई है ताकि लोग निजी वाहनों की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट (मेट्रो और इलेक्ट्रिक बसों) का इस्तेमाल करें। हालांकि, इसके बावजूद पराली जलाने की घटनाओं, औद्योगिक धुएँ और वाहनों के अनियंत्रित प्रदूषण पर कोई ठोस और स्थायी समाधान न निकल पाने से जनता में भारी नाराजगी है।
विपक्षी राजनीतिक दलों ने वायु प्रदूषण को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र पर नीतिगत विफलता का आरोप लगाया है, जबकि पर्यावरणविदों का कहना है कि केवल ग्रेप के अस्थायी चरणों से यह संकट हल नहीं होने वाला। दिल्ली-एनसीआर को एक एकीकृत अंतर-राज्यीय पर्यावरण मास्टर प्लान की आवश्यकता है।
यह सनसनीखेज स्वास्थ्य संकट एक बार फिर यह तीखा सवाल खड़ा करता है कि आर्थिक विकास और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की तमाम उपलब्धियों के बीच क्या हम अपने नागरिकों को जीने के लिए साफ हवा जैसा बुनियादी अधिकार देने में भी विफल हो रहे हैं।
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