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नौसेना को नए युद्धपोत

देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री सीमाओं की अभेद्य किलाबंदी और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के इतिहास में आज का दिन एक बेहद ऐतिहासिक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। रक्षा मंत्रालय ने नई दिल्ली में आयोजित एक उच्च स्तरीय

कल्ट करंट डेस्क
कल्ट करंट डेस्क
04 Nov 2026
Solar farm during sunset

देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री सीमाओं की अभेद्य किलाबंदी और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के इतिहास में आज का दिन एक बेहद ऐतिहासिक अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। रक्षा मंत्रालय ने नई दिल्ली में आयोजित एक उच्च स्तरीय कार्यक्रम के दौरान भारतीय नौसेना (Indian Navy) के लिए 8 अत्याधुनिक नेक्स्ट-जनरेशन वॉरशिप्स/कोर्पेट्स (Next-Generation Corvettes - NGC) के स्वदेशी निर्माण हेतु ₹53,866.50 करोड़ के भारी-भरकम अनुबंध पर औपचारिक हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस मेगा डिफेंस प्रोजेक्ट के तहत इन आधुनिक युद्धपोतों का निर्माण देश के दो प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के शिपयार्डों—गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता—द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा।

यह नए युद्धपोत रक्षा प्रौद्योगिकी के मामले में दुनिया के सबसे सक्षम और घातक जहाजों में से एक होंगे। इनमें उन्नत स्टील्थ फीचर्स (Stealth Features) शामिल होंगे, जिससे ये दुश्मन के रडार और नौसैनिक सेंसर्स की पकड़ में आसानी से नहीं आएंगे। इसके अतिरिक्त, ये जहाज पूरी तरह स्वदेशी वर्टिकल-लॉन्च मिसाइल प्रणालियों, एंटी-सबमरीन रॉकर्स, एआई-आधारित युद्ध प्रबंधन प्रणालियों (Combat Management Systems) और अत्याधुनिक रडार नेटवर्क से लैस होंगे। ये युद्धपोत सतह से सतह, सतह से हवा और पानी के भीतर पनडुब्बियों से मिलने वाली हर प्रकार की चुनौती को दूर से ही समाप्त करने की असीम मारक क्षमता रखेंगे।

भारतीय सामरिक परिप्रेक्ष्य में यह ऐतिहासिक रक्षा डील ऐसे समय में हुई है जब हिंद महासागर क्षेत्र (Indo-Pacific Region) में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) की गतिविधियां और उपस्थिति तेजी से बढ़ रही हैं। भारत के 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबे समुद्री तट और विशाल एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) की सुरक्षा के लिए नौसेना का यह आधुनिक विस्तार बेहद आवश्यक था। ये 8 नए युद्धपोत न केवल भारत के तटीय बेड़े को नया बल देंगे, बल्कि हिंद महासागर में भारत को 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' के रूप में अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत करने में मदद करेंगे।

आर्थिक और औद्योगिक मोर्चे पर, इस ₹53,866.50 करोड़ के भारी-भरकम पूंजीगत निवेश (Capital Expenditure) का सीधा लाभ देश के घरेलू एयरोस्पेस और नौसैनिक एमएसएमई (MSME) सेक्टर को मिलेगा। परियोजना के तहत 60% से अधिक कंपोनेंट्स और सामग्रियां स्वदेशी भारतीय रक्षा कंपनियों से ली जाएंगी। इससे विनिर्माण क्षेत्र में हजारों उच्च-कुशल इंजीनियरों, तकनीशियनों, शिपबिल्डिंग कारीगरों और सहायक उद्योगों के लिए अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

रक्षा विशेषज्ञों और नौसेना अधिकारियों का मानना है कि स्वदेशी शिपयार्डों में इन जहाजों का निर्माण 'मेक इन इंडिया' और रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता की ओर भारत की बहुत बड़ी जीत है। इससे भविष्य में विदेशी नौसैनिक खरीदारों को भी आकर्षित किया जा सकेगा, जिससे भारत एक प्रमुख हथियार निर्यातक राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा।

यह विशाल रक्षा सौगात यह सिद्ध करती है कि 21वीं सदी का नया भारत अपनी नीली क्रांति और नौसैनिक संप्रभुता की रक्षा के लिए विदेशी निर्भरता को पूरी तरह खत्म करते हुए अपने बल पर वैश्विक समुद्रों का सिकंदर बनने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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