शांति की मृगमरीचिका

मनोज कुमार

 |  02 Feb 2026 |   101
Culttoday

वैश्विक कूटनीति की बिसात पर चालें अक्सर उतनी सीधी नहीं होतीं जितनी वे प्रथम दृष्टया प्रतीत होती हैं; वे बहुपरतीय होती हैं और उनके गर्भ में विरोधाभासों का एक अनंत संसार छिपा होता है। जनवरी 2026 की सर्द हवाओं के बीच, नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक के गलियारों में एक प्रस्ताव ने अजीब सी सिहरन और गर्माहट पैदा कर दी है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने जब डिजिटल मंच पर यह साझा किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाजा के लिए नवगठित 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होने का निमंत्रण दिया है, तो सतही तौर पर यह भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत और प्रभाव का परिचायक प्रतीत हुआ। राजदूत गोर, जिन्होंने हाल ही में राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष अपना परिचय पत्र प्रस्तुत किया है, का तर्क संभवतः यह होगा कि इजराइल के साथ भारत के प्रगाढ़ संबंध और फिलिस्तीनी हितों के प्रति उसकी ऐतिहासिक व नैतिक प्रतिबद्धता उसे इस बोर्ड के लिए एक आदर्श उम्मीदवार बनाती है।
किंतु, कूटनीति के गहरे सागर में जो सतह पर दिखता है, वह अक्सर यथार्थ नहीं होता। यह निमंत्रण एक 'स्वर्ण पिंजरे' जैसा है—बाहर से चमकदार और लुभावना, लेकिन भीतर से किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्तता को कैद कर लेने वाला। भारत, जो अपनी हजारों वर्षों की सभ्यतागत विरासत, लोकतांत्रिक मूल्यों और गुटनिरपेक्षता की नींव पर खड़ा है, के लिए यह क्षण भावुकता में बहने का नहीं, बल्कि अत्यंत सतर्कता, दूरदर्शिता और रणनीतिक विवेक का है। यह प्रस्ताव केवल गाजा में शांति बहाली का नहीं है, बल्कि यह संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं के अस्तित्व और भारत की अपनी कूटनीतिक आत्मा के बीच चुनाव का एक गंभीर प्रश्न है।
शांति का 'बोर्ड' या संयुक्त राष्ट्र के समानांतर एक निजी सत्ता?
इस प्रस्ताव की तह में जाने पर एक कड़वी और असुविधाजनक सच्चाई उभरती है। ट्रम्प का यह तथाकथित 'शांति बोर्ड' वास्तव में गाजा में मानवीय सहायता या शांति स्थापना का कोई पवित्र अनुष्ठान नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के समानांतर एक निजी और कॉरपोरेट सत्ता खड़ी करने का दुस्साहसपूर्ण प्रयास है। सितंबर 2025 में प्रस्तावित इस बोर्ड का घोषित उद्देश्य भले ही 'स्थिरता को बढ़ावा देना, कानून का शासन बहाल करना और संघर्ष क्षेत्रों में शांति सुरक्षित करना' बताया गया हो, लेकिन इसकी अंतर्निहित मंशा और इसकी आत्मा कुछ और ही कहानी बयां करती है।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने 15 जनवरी को इस बोर्ड की औपचारिक घोषणा करते हुए जो तर्क दिया, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए खतरे की घंटी है। उन्होंने कहा कि 'संयुक्त राष्ट्र ने मेरी कभी मदद नहीं की।' यह एक वाक्य ही इस बोर्ड की बुनियाद को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। यह बोर्ड मानवीय करुणा या विश्व शांति की अभिलाषा से नहीं, बल्कि ट्रम्प की व्यक्तिगत कुंठा और संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक बनाने की उनकी पुरानी और जगजाहिर महत्वाकांक्षा से जन्मा है। भारत, जो संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है और जिसने पिछले सात दशकों में बहुपक्षवाद की वकालत करते हुए विश्व मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है, क्या वह एक ऐसे मंच का हिस्सा बन सकता है जिसका एकमात्र उद्देश्य उस वैश्विक व्यवस्था को ध्वस्त करना है जिसे बनाने में स्वयं भारत का पसीना और रक्त लगा है? यह भारत के लिए आत्मघाती कदम होगा।
गाजा: 'मध्य पूर्व का रिवेरा'
ट्रम्प का दृष्टिकोण कूटनीतिक कम और विशुद्ध रूप से व्यावसायिक अधिक है। फरवरी 2025 में इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हुई बैठक में ट्रम्प ने गाजा को 'मध्य पूर्व का रिवेरा' बनाने का सपना देखा था। उनके लिए, युद्ध से ध्वस्त गाजा एक मानवीय त्रासदी नहीं, जहां लाखों लोग बेघर और भूखे हैं, बल्कि एक 'डिमोलिशन साइट' है, जिसमें गगनचुंबी इमारतें खड़ी करने, होटल बनाने और रियल एस्टेट का मुनाफा कमाने की अपार संभावनाएं हैं।
जब एक महाशक्ति का राष्ट्रपति किसी संप्रभु क्षेत्र को 'कब्जा करने' और उस पर 'स्वामित्व' जमाने की बात करता है, तो यह आधुनिक युग में 19वीं सदी की उपनिवेशवादी मानसिकता की दुर्गंध देता है। भारत, जिसने सदियों तक औपनिवेशिक शोषण का दंश झेला है और जो हमेशा साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ा रहा है, क्या वह गाजा के पुनर्निर्माण के नाम पर चल रहे इस 'रियल एस्टेट प्रोजेक्ट' का भागीदार बन सकता है? गाजा के मलबे के नीचे दबी मासूमों की चीखें किसी 'रिवेरा' के निर्माण की ईंटें नहीं बन सकतीं। भारत की अंतरात्मा, उसके संस्कार और उसकी विदेश नीति का नैतिक आधार उसे ऐसे किसी भी उपक्रम से दूर रहने की सलाह देता है जो पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाने के बजाय उन पर कंक्रीट का जंगल खड़ा करने को प्राथमिकता देता हो।
एक व्यक्ति का दरबार और अरबों का 'प्रवेश शुल्क'
इस बोर्ड की संरचना किसी लोकतांत्रिक संस्था की नहीं, बल्कि एक तानाशाही कॉरपोरेट बोर्ड की तरह है। इसके स्वयंभू 'चेयरमैन ट्रम्प' के पास प्रस्ताव पारित करने, बिना किसी परामर्श के पहल करने और वीटो शक्ति का उपयोग करने का एकाधिकार होगा। यह 'एक व्यक्ति का शो' है, जहाँ अन्य देशों की भूमिका केवल मूक दर्शकों या वित्तपोषकों की होगी।
सबसे हास्यास्पद और चिंताजनक पहलू यह है कि इस बोर्ड में स्थायी सीट पाने के लिए देशों को 1 अरब डॉलर यानी लगभग 8300 करोड़ रुपये का 'प्रवेश शुल्क' चुकाना होगा। शांति की कीमत लगाना कूटनीति का सबसे भद्दा मजाक है। क्या भारत, जो विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखता है और जिसके अपने देश में विकास की अनंत आवश्यकताएं हैं, एक अमेरिकी राजनेता की व्यक्तिगत सनक और फंतासी से संचालित बोर्ड का सदस्य बनने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा देगा? यह न केवल भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का अपमान होगा, बल्कि यह उस सिद्धांत के भी खिलाफ होगा जिसके तहत भारत हमेशा संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले ही शांति अभियानों में भाग लेता आया है।
इसके अतिरिक्त, इस बोर्ड की आयु भी ट्रम्प के कार्यकाल या उनकी व्यक्तिगत रुचि पर निर्भर करती है। जब ट्रम्प सत्ता से हटेंगे या उनका मन बदल जाएगा, तो यह बोर्ड ताश के पत्तों की तरह बिखर सकता है। भारत जैसी स्थिर, गंभीर और दीर्घकालिक सोच रखने वाली शक्ति के लिए ऐसे तदर्थ और अस्थाई मंचों में निवेश करना रणनीतिक अदूरदर्शिता होगी। भारत की विदेश नीति क्षणिक लाभों के लिए नहीं, बल्कि शाश्वत मूल्यों के लिए जानी जाती है।
भारत का कूटनीतिक चरित्र और नीतियों का विरोधाभास
स्वतंत्रता के बाद के सात दशकों में, भारत की विदेश नीति की सफलता गुटनिरपेक्षता, रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय स्वाभिमान को बनाए रखने में निहित रही है। यद्यपि भारत के संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली को लेकर अपने गंभीर मतभेद हैं और वह सुरक्षा परिषद में सुधारों की मांग करता रहा है, तथापि वह कभी भी संयुक्त राष्ट्र को समाप्त करने या उसे कमजोर करने के पक्ष में नहीं रहा है। भारत का यह दृढ़ विश्वास है कि इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष जैसे ध्रुवीकरण करने वाले और भावनात्मक मुद्दों को केवल संस्थागत दृष्टिकोण से ही सुलझाया जा सकता है, किसी व्यक्ति विशेष के एजेंडे से नहीं।
ट्रम्प का इजराइल-फिलिस्तीन दृष्टिकोण भारत की पारंपरिक और संतुलित नीति से मेल नहीं खाता। ट्रम्प ने यरूशलेम को इजराइल की राजधानी के रूप में मान्यता देने में जो जल्दबाजी दिखाई और फिलिस्तीनी प्राधिकरण को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया, वह भारत के रुख के बिल्कुल विपरीत है। भारत आज भी तेल अवीव को ही इजराइल की कूटनीतिक राजधानी मानता है और शांति वार्ता में फिलिस्तीनी प्राधिकरण की प्रमुखता का समर्थन करता है। भारत का स्पष्ट मानना है कि 'दो-राष्ट्र समाधान' के ढांचे के भीतर शांतिपूर्ण बातचीत ही मध्य पूर्व में स्थाई शांति की गारंटी है। भारत ने हमेशा—चाहे वह इजराइल-फिलिस्तीन हो या रूस-यूक्रेन—तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के बजाय आपसी बातचीत या संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में समाधान को प्राथमिकता दी है। ट्रम्प का बोर्ड इस सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।
इतिहास के पन्नों से सबक: वाजपेयी की विरासत
यह पहली बार नहीं है जब भारत के सामने अमेरिका की एकतरफा पहल में शामिल होने का दबाव है। इतिहास हमें राह दिखाता है। वर्ष 2003 में, जब जॉर्ज बुश प्रशासन ने इराक युद्ध के लिए भारतीय सेना की मांग की थी और भारत पर भारी दबाव बनाया था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उसे ठुकरा दिया था। उनका तर्क स्पष्ट और अडिग था—भारत केवल संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले ही शांति अभियानों में अपने सैनिक भेजेगा, किसी देश विशेष के युद्ध या अभियान में नहीं।
आज प्रधानमंत्री मोदी के सामने भी कमोबेश वैसी ही स्थिति है। ट्रम्प का यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के जनादेश से रहित है। इसमें शामिल होकर भारत अपनी उस विश्वसनीयता को जोखिम में डाल देगा जो उसने दशकों में 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनकर कमाई है। यदि भारत इस निजी प्रोजेक्ट का समर्थन करता है, तो वह उन अरब देशों और फिलिस्तीनी लोगों की नजरों में अपनी साख खो देगा जो भारत को एक निष्पक्ष मित्र मानते हैं।
रचनात्मक दूरी और संस्थागत सहयोग
तो क्या भारत को इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देना चाहिए? कूटनीति में 'ना' कहने का भी एक तरीका होता है। ट्रम्प के बोर्ड में शामिल न होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि भारत मध्य पूर्व के मुद्दों से मुंह मोड़ ले या वहां की पीड़ा के प्रति उदासीन हो जाए। भारत के पास अपनी भूमिका निभाने के लिए कई सार्थक और सम्मानजनक रास्ते हैं, जिनके लिए उसे किसी अरबपति क्लब की सदस्यता शुल्क चुकाने की आवश्यकता नहीं है।
भारत मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। वह सीधे तौर पर या 'फिलिस्तीन शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी' के माध्यम से गाजा के लोगों को चिकित्सा सहायता, भोजन और पुनर्निर्माण सामग्री प्रदान कर सकता है। यह मदद किसी राजनीतिक शर्त या 'फीस' के बिना होनी चाहिए, जो भारत की 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना के अनुरूप हो। इसके अलावा, रामल्ला में अपने प्रतिनिधि कार्यालय के माध्यम से भारत फिलिस्तीनी नेतृत्व के साथ संवाद जारी रख सकता है और शांति प्रयासों में रचनात्मक योगदान दे सकता है। भारत को वाशिंगटन पर यह कूटनीतिक दबाव भी बनाना चाहिए कि यदि वह वास्तव में शांति चाहता है, तो इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र के 'शांति अभियान विभाग' का हिस्सा बनाया जाए। इससे इस पहल को वैश्विक वैधता मिलेगी और यह किसी व्यक्ति की निजी जागीर बनने से बच जाएगा।
मृगमरीचिका से परे यथार्थ का चयन
अंततः, ट्रम्प का 'शांति बोर्ड' रेगिस्तान में चमकती हुई एक ऐसी मृगमरीचिका है, जिसके पास जाने पर प्यास बुझने के बजाय केवल रेत और हताशा ही हाथ लगेगी। यह एक 'जाल' है जो भारत को संयुक्त राष्ट्र विरोधी खेमे में खड़ा कर सकता है और उसकी गुटनिरपेक्ष छवि को धूमिल कर सकता है। कूटनीति का तकाजा है कि भारत, अमेरिका के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों की प्रगाढ़ता को बनाए रखे, लेकिन अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को गिरवी न रखे।
भारत को बड़ी विनम्रता लेकिन दृढ़ता के साथ इस निमंत्रण को अस्वीकार करना चाहिए, यह स्पष्ट करते हुए कि 'शांति, व्यापार की वस्तु नहीं है, और न ही कूटनीति कोई रियल एस्टेट का सौदा।' भारत का भविष्य बहुपक्षवाद और नियम-आधारित विश्व व्यवस्था में निहित है, न कि 'चेयरमैन ट्रम्प' की अध्यक्षता वाले किसी महंगे, अस्थिर और व्यक्तिगत क्लब में। एक विश्वगुरु के रूप में भारत का दायित्व है कि वह आसान और लुभावने रास्ते के बजाय सही और नीतिगत रास्ते का चयन करे, भले ही वह रास्ता कांटों भरा क्यों न हो। भारत की शक्ति उसकी नैतिकता में है, और उसे किसी भी कीमत पर बचाए रखना ही सच्ची कूटनीति है। n

(लेखक काबुल में भारतीय राजनयिक के रूप में सेवा दे चुके हैं।)
 


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