नफ़ासत पसंद शरद जोशी

श्रीराजेश

 |  01 Oct 2018 |   655
Culttoday

सन 1980 के साल का दिसंबर महीना था. पहले हफ्ते की 6 तारीख को एक्प्रेस टॉवर, मुंबई की सीढ़ियां चढ़ रहा था. चंद मिनट बाद शरद जोशी (संपादक, हिंदी एक्सप्रेस) के सामने था. जोशी जी चंद महीने पहले शुरू हुई 'हिंदी एक्सप्रेस' का हाल सुना रहे थे. यह मेरी उनके साथ इंटरव्यू के बाद की दूसरी मुलाकात थी. बोले - अभी हम एक दो सीनियर स्टॉफ लेने की सोच रहे हैं, आप को एक-दो महीने बाद ज्वाइन कराते हैं. अभी आप आये हो, चार-छह दिन रुको. मैं दो दिन के लिए दिल्ली जा रहा हूँ. लौटकर आता हूँ तब और बातें होतीं हैं. 
इस बीच के दिन स्टॉफ के साथ अंतरंग होने में बीते, सभी आत्मीय और सहज. सम्पादकीय में रश्मि राज़दान और टाइपिस्ट मिश्रा जी ख़ास मेहरबान रहे, रश्मि ने तो ऐलान ही कर दिया, ‘आप  हिंदी एक्सप्रेस की टीम से जुड़ चुके हैं, हम जोशी जी से बात करेंगे, आपको अभी ज्वाइन कराएंगे.’ 
जोशी जी लौटकर आये और औपचारिक बातों के बाद बोले, ‘ये जो भागलपुर आँख फोड़ काण्ड हुआ है, इस पर आर्टिकल बना दो.’ 
मैं काम में लग गया. जोशी जी आधे घंटे बाद पास आये बोले, ‘हम सोचते हैं, क्या एक महीने क्या दो महीने. जब आप आ ही गए है तो ज्वाइन ही करवा लेते हैं.’
मैंने अपनी प्राइमरी की अध्यापकी का हवाला देते हुए हल्का असमंजस जाहिर किया. कुछ और बातें कर जोशी जी लेख पूरा करके लंच साथ करने की बात कहकर चले गए. 
लंच के दौरान जोशी ने कहा, ‘हम जीएम साहब से मिलकर आप के ज्वाइनिंग पेपर बनवा आये हैं. आप जाकर उनसे मिल लेना.’ 
इस तरह अपनी पत्रकारिता की पहली नौकरी का सिलसिला शुरू हुआ. 
यह नॉरीमन प्वाइंट स्थित एक्सप्रेस टॉवर का सेकेंड फ्लोर है. लंबा-सा हाल, एक तरफ डॉम मारेस अपनी ‘संडे स्टैडर्ड’ की टीम के साथ बैठते है. एक तरफ हम शरद जोशी की टीम. मेरी सिटिंग के बायीं तरफ ओबेराय होटल का स्वीमिंग पूल है, सामने समंदर का अनंत विस्तार, कोई कागज़ मेज से गिरे तो सीधे समंदर में ही जाए. शाम होते-होते एक बार फिर सूर्योदय जैसा होता है जब अकसर श्वेत परिधान में लीला नायडू का आगमन होता है. लीला नायडू, श्रीमती डॉम मारेस. सुबह कभी जब मैं जल्दी आ जाता तो डॉम मारेस चाय-नाश्ते वाले बच्चों से हिंदी में बतियाते मिलते. इशारे से मुझे भी चाय के लिए बुला लेते. 
ज्वाइनिंग के चंद दिनों बाद ही मैं कालबा देवी के पास भूलेश्वर के पंचमुखी हनुमान मंदिर में रहने का ठिकाना पा गया था. सुबह मैं चर्नी रोड स्टेशन की तरफ से समंदर के किनारे-किनारे पैदल ही मरीन लाइंस होते हुए एक्सप्रेस टॉवर आ जाता. शाम से ज्यादा सुहानी तो मुम्बई सुबह लगती. सात सौ की पगार, मंदिर का रहना, एक्सप्रेस टॉवर में दफ्तर, शरद जोशी जैसा संपादक, समंदर का सहारा, बंदा आवारा - और क्या चाहिए इस बम्बई यानी बॉम्बे में. तब मुंबई नाम चलन में ज्यादा नहीं था. 
शाम को दफ्तर से जोशी के साथ अकसर चर्चगेट तक पैदल ही आना होता था. तरह-तरह की बातें, यहां सड़क लाल बत्ती होने पर ही पार करने से लेकर तमाम बातें. 
ऐसे ही चलते-चलते जोशी बुदबुदाए, '....उसको मिली कोल्हापुरे, हमको मिली कोल्हापुरी'.
हमने पूछा, ‘ऐसा आपने क्या किया कि आपको कोल्हापुरी मिली ?’
‘कल बताऊंगा’, और फुर्ती से निकल लिए. 
दूसरे दिन प्रिंस चाल्स और पद्मिनी कोल्हापुरे के चुम्बन प्रकरण पर अपने कॉलम 'नावक के तीर'  के लिये लिखा लेख पढ़वाया. काफी चर्चित हुआ था यह व्यग्य. 
नफ़ासत पसंद शरद जोशी जी के साथ कारवां बढ़ चला. जोशी जी का चर्चित कॉलम 'नावक के तीर' एडिट करने को मिला. अपना संपादक जागा, विधिवत संपादित किया. कॉलम दो पेज में जाना था, नाप-जोख कर देखा थोड़ा कम लगा. जोशी को बताया तो बोले, ‘हम तो बरसों से नाप-जोख कर एकदम सटीक लिखते हैं, न दो शब्द कम न ज्यादा. लाइए कुछ और जोड़ देते हैं.’ बरसों बाद मैंने कहीं पढ़ा कि 'नई दुनिया' के समय राजेंद्र माथुर जोशी का लिखा बिना काट-छांट के सीधे छपने को भेजते थे. बाद में बड़ी ग्लानि हुई मुझे, लेकिन तब जोशी जी ने यह  सब बड़ी सहजता से लिया था. हालांकि तब मुझे स्वत: आभास हो गया कि ऐसे कॉलम या विशिष्ट जनों के आलेख आदि में ज्यादा संपादकीय कौशल नहीं दिखाया जाता.
जोशी जी एक पंडित जी को प्रूफ संशोधक के रूप में 'नवनीत' पत्रिका से लाये थे. वे जोशी जी को बताते थे कि व्याकरण के हिसाब से आपका लेखन बहुत अशुद्ध है. जोशी जी उनका बड़ा आदर करते थे. बड़े आदर भाव से जोशी जी ने उन्हें बताया कि भाषा की गरिष्ठता और व्याकरण का शास्त्रीय आग्रह तो हमारी व्यंग्य विधा को मार डालेगा. ऐसे में यह शरद जोशी कहाँ बचेगा. कुछ दिन बाद जोशी जी ने उनके अनुरूप जीविका की व्यवस्था कर उन्हें सादर विदा दी. 
मैग्जीन की लीडर तो रश्मि ही थीं, प्लानिंग वगैरह जोशी जी के साथ मिलकर वही करती थीं. लेआउट और हेडिंग आदि बनाने में मुझे मज़ा आता था. सम्पादकीय के बजाय मुझे कला विभाग में ज्यादा अच्छा लगता था, ज्यादातर मैं वहीं पाया जाता था. जोशी जी जब मुझे पुकारते तो उनकी पुकार मुझसे अनसुनी रह जाती फिर रश्मि आवाज़ लगाती - टिल्लन जी, जोशी जी !!! तब मैं जोशी के सामने होता. ‘कहाँ खोये रहते हैं, शरद जोशी का पुरुष कंठ आपकी तन्द्रा नहीं तोड़ पाता. रश्मि की आवाज़ जब अग्रसारित करती है तब जाग्रत होते हैं.’ 
प्रमिला कालरा, जो ज्यादातर सिनेमा और फ़िल्मी सितारों पर लिखती थीं, एक दिन स्कूली कॉपी के चार-पांच पेज लिखकर और आई कार्ड से निकालीं एक बच्चे की फोटो ले कर आईं. बोलीं कि ये छाप दो. कुछ दिन ये लेख ऐसे ही रखा रहा. मैंने जोशी जी को बताया कि ये लेख प्रमिला ने दिया है. जोशी जी ने देखा और कहा, ‘ठीक करके छाप दीजिये.’ लेख छपा. तीन-चार महीने बाद आई कार्ड के फोटो में मुस्कुराता यह बच्चा रवि शास्त्री के नाम से पहचाना गया. 

शरद जोशी जी कितने खूबसूरत हैं . हिंदी एक्सप्रेस के शुरुआती दिन थे . करंट के संपादक पमादरणीय डॉ महावीर अधिकारी से मुखातिब थे , अधिकारी जी बोले , टिल्लन जी आपके अलावा तो हिंदी एक्सप्रेस में और कोई मर्द तो है नहीं. मैंने आदर सहित कहा , नहीं जोशी जी हैं न ! अधिकारी जी खुल कर हँसे , नहीं जोशी जी मर्द की श्रेणी में नहीं आते . गुरू वो तो साक्षात कामदेव हैं . जब वो नए नए बम्बई आये थे तो क्या गज़ब की खूबसूरती थी , लगता था कि जैसे अभी अभी वाशरूम से मूंद धो कर आ रहे हों . ...जितने दिखने में खूबसूरत हैं , उतने मन के भी खूबसूरत हैं ....खूबसूरत दिनों की खूबसूरत यादें .
‘सम्पादक शरद जोशी’ से बहुत बड़े थे ‘रचनाकार शरद जोशी.’ सम्पादकीय परपंच उनकी फितरत नहीं थी. वे मुक्त छंद थे. कई फिल्में लिखीं, संवाद लिखे. ‘प्रतिदिन’ कॉलम खूब चर्चित रहा. उन दिनों मनोहर श्याम जोशी का 'हमलोग' और शरद जोशी जी का 'ये जो है जिंदगी' धारावाहिक खूब चर्चित रहे. 

स्रोतः गंभीर समाचार


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