वन बेल्ट वन रोड के कारण भारत-चीन के संबंध होंगे ख़राबः चीनी मीडिया

जलज वर्मा

 |  03 Jun 2017 |   443
Culttoday

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 'वन बेल्ट वन रोड' की बैठक में आमंत्रण के बावजूद भारत के शामिल नहीं होने पर इस मुद्दे को काफी महत्व दिया है. अख़बार कहता है, ''संप्रभु देश के तौर पर भारत को निर्णय लेने का हक़ है कि वह बैठक में शामिल हो या नहीं. भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे लेकर 13 मई को बैठक में शामिल नहीं होने का कारण बताया था. इस मामले में कई चीनी पर्यवेक्षकों ने भी अतिश्योक्तिपूर्ण बातें कही हैं.'' अख़बार के मुताबिक, ''भारत की मौजूदगी से इस फोरम की बैठक की सफलता पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन कुछ चीनी पर्यवेक्षक इस बात को लेकर आशंकित हैं कि वन बेल्ट वन रोड के कारण चीन और भारत के संबंध ख़राब होंगे.''

पिछले महीने ही इसकी बैठक चीन की राजधानी बीजिंग में हुई थी. ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक इस बैठक में 130 से ज़्यादा देश शामिल हुए थे.

ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि इस साल के सबसे बड़े राजनयिक आयोजन में अमरीका और जापान ने भी अपना प्रतिनिधिमंडल भेजा था. ग्लोबल टाइम्स ने कहा कि वन बेल्ट वन रोड परियोजना के करीब भारत एकमात्र ऐसा देश है जो इस बैठक में नहीं आया.

अख़बार ने लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चीनी सरकार ने इस बैठक में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था लेकिन वह नहीं आए.

वन बेल्ट वन रोड फोरम की बीजिंग बैठक के एक हफ़्ते बाद भारत ने अफ़्रीकी विकास बैंक समूह की 52वें वार्षिक बैठक का आयोजन गुजरात में किया.

अख़बार ने लिखा है, ''इस बैठक में पीएम मोदी ने एक 'एशिया-अफ़्रीका ग्रोथ कॉरिडोर' की वकालत की. दरअसल यह नवंबर में मोदी की जापान यात्रा के दौरान वहां के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के 'फ्रीडम कॉरिडोर' आइडिया की नक़ल है.

भारतीय मीडिया इसे एशिया-अफ़्रीका कनेक्टिविटी के तौर पर देखा रहा है और वन बेल्ट वन रोड के समानांतर पेश कर रहा है.''

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि न्यू सिल्क रोड और इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक कॉरिडोर को फिर से शुरू करने की अमरीकी योजना को भारतीय मीडिया ने कुछ ज़्यादा ही तूल दिया. अख़बार के मुताबिक अमरीका की इस योजना को भी भारतीय मीडिया ने वन बेल्ट वन रोड के मुकाबले के तौर पर खड़ा किया. भारतीय मीडिया में यह भी कहा गया कि इसमें नई दिल्ली की बड़ी भूमिका होगी.

अख़बार ने लिखा है कि भारत सरकार के पदाधिकारियों और वहां के मीडिया घरानों ने वन बेल्ट वन रोड को लेकर अपनी सामरिक चिंता दिखाई है. वन बेल्ट वन रोड से मुकाबले के लिए कई तरह की बातें की जाने लगीं. अख़बार ने लिखा है कि जब भारत में ऐसी बातें चल रही थीं तब अमरीका और जापान के प्रतिनिधिमंडल बीजिंग में थे.

ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक 2011 में अमरीका की तत्कालीन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने अफ़ग़ानिस्तान को ध्यान में रखकर न्यू सिल्क रोड की बात की थी. अफ़ग़ानिस्तान के ज़रिए मध्य एशिया और दक्षिण एशिया में लिंक स्थापित करने की बात थी. इसके ज़रिए ऊर्जा समाधान और अफ़ग़ानिस्तान मुद्दे को प्रभावी तरीके से काबू में करने की बात थी.

अख़बार ने लिखा है, ''इंडो-पैसिफिक कॉरिडोर योजना का प्रस्ताव 2014 में रखा गया था. यह मेकोंग-गंगा कोऑपरेशन की तरह है जिसके बारे में भारत ने 2001 में विचार किया था. चीन ने इन योजनाओं को लेकर कोई अड़ंगा नहीं लगाया था. यदि इसमें कोई गुंजाइश है तो पूरा किया जाना चाहिए.''

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''न तो तथाकथित फ्रीडम कॉरिडोर और न ही एशिया-अफ़्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का वन बेल्ट वन रोड से कोई टकराव है. पिछले तीन सालों में इस परियोजना को दक्षिण एशिया, हिन्द महासागर और अफ़्रीकी प्रायद्वीप के बीच आर्थिक तरक्की को प्रोत्साहित करने का काम किया गया है.''

अख़बार लिखता है, ''भारत और जापान चीन से होड़ करना चाहते हैं लेकिन चीन का लक्ष्य व्यापार को सुगम बनाना है. भारत व्यापक आर्थिक सहयोग के ज़रिए एक उदार शक्ति बना है. अफ़्रीकी देशों और भारतीय नागरिकों के बीच संपर्क से चीन को सीखने की ज़रूरत है.''

ग्लबोल टाइम्स ने लिखा है, ''बांग्लादेश-चीन-म्यांमार इकोनॉमिक कॉरिडोर का भी भारत प्रस्तावक रहा है. इस पर पिछले महीने तीसरे जॉइंट स्टडी ग्रुप की बैठक कोलकाता में हुई थी. हालांकि इसमें कोई ठोस प्रगति नहीं है.


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