जनरल मुनीर का अमेरिकी दौरा: कूटनीति की नई चाल या संतुलन की साज़िश?

संदीप कुमार

 |  12 Jun 2025 |   213
Culttoday

14 जून 2025 को अमेरिका द्वारा आयोजित 250वें यू.एस. आर्मी डे पर पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर को भेजा गया औपचारिक आमंत्रण महज एक सैन्य औपचारिकता नहीं है। यह कदम दक्षिण एशिया की भूराजनैतिक बिसात पर बिछाई गई एक रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है, जो अनेक परतों और इशारों से भरा है। भारत, चीन और पाकिस्तान—तीनों के लिए यह एक अहम संकेत है कि अमेरिका अपने हितों के लिए परंपरागत दृष्टिकोण से आगे जाकर नई रणनीति अपना रहा है।

पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका कोई रहस्य नहीं है। ऐसे में अमेरिका द्वारा जनरल मुनीर को सीधे आमंत्रण देना इस ओर इशारा करता है कि वॉशिंगटन अब इस्लामाबाद की निर्वाचित सरकार के बजाय रावलपिंडी की ताकतवर सैन्य सत्ता से संवाद को प्राथमिकता दे रहा है। यह संकेत है कि अमेरिका दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए पुराने सैन्य साझेदारों को फिर से सक्रिय करना चाहता है।

यह दौरा अमेरिकी विदेश नीति की व्यावहारिकता और तात्कालिक हितों पर आधारित उस रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है, जिसमें लोकतंत्र के आदर्शों के बजाय भू-राजनीतिक लाभ को वरीयता दी जा रही है। इससे एक ओर अमेरिका को पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र तक सीधी पहुँच मिलेगी, वहीं दूसरी ओर बीजिंग को यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि इस्लामाबाद अब केवल एक ध्रुव पर आश्रित नहीं रहना चाहता।

चीन, जो दशकों से पाकिस्तान का रणनीतिक संरक्षक रहा है और अरबों डॉलर के चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) में निवेश कर चुका है, इस घटनाक्रम से असहज है। चीन की चुप्पी इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान की बहुध्रुवीय कूटनीतिक दिशा उसे अप्रिय लग रही है। यदि पाकिस्तान अमेरिकी प्रभाव को फिर से स्वीकार करता है, तो यह CPEC जैसी परियोजनाओं के लिए अस्थिरता और अनिश्चितता का कारण बन सकता है।

चीन की चिंता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामरिक भी है। दक्षिण एशिया में अमेरिका की सैन्य पहुंच का पुनः सुदृढ़ होना, बीजिंग की इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए चुनौती बन सकता है।

इस यात्रा ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक साख पर भी प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या जनरल मुनीर की यात्रा सरकार की अनुमति से हो रही है? विपक्ष का तर्क है कि विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषयों में सरकार की भूमिका लगातार सीमित होती जा रही है। यदि अमेरिका और पाकिस्तान के बीच उच्च स्तरीय सैन्य संवाद बिना नागरिक नेतृत्व की जानकारी या भागीदारी के हो रहा है, तो यह पाकिस्तान के संस्थागत ढांचे की कमजोरी को उजागर करता है।

भारत और अमेरिका के बीच हाल के वर्षों में संबंध ऐतिहासिक ऊँचाइयों पर पहुंचे हैं—QUAD, iCET, रक्षा व्यापार, और रणनीतिक संवाद इसका प्रमाण हैं। ऐसे में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान सेना से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करना भारत के लिए एक झटका है, विशेष रूप से उस समय जब कश्मीर घाटी में आतंकी गतिविधियों में वृद्धि देखी जा रही है और उनके पीछे पाकिस्तान की भूमिका संदेह के घेरे में है।

भारत के विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस, ने इसे कूटनीतिक विफलता करार दिया है। जयराम रमेश ने सरकार से संसद का विशेष सत्र बुलाने और अमेरिका के साथ संबंधों की समीक्षा की माँग की है। यह दर्शाता है कि यह विषय केवल अंतरराष्ट्रीय रणनीति का नहीं, बल्कि आंतरिक राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन गया है।

जनरल मुनीर की अमेरिका यात्रा को केवल एक सैन्य औपचारिकता मानना भूल होगी। यह अमेरिका की तरफ से एक स्पष्ट संदेश है—वह दक्षिण एशिया में नई शक्ति-परिकल्पना के साथ सक्रिय हो रहा है। पाकिस्तान की ओर से सेना की यह सक्रिय भूमिका उसके लोकतंत्र की कमजोरियों को उजागर करती है। चीन के लिए यह झटका है, और भारत के लिए यह सतर्क रहने का समय।

यह घटनाक्रम यह भी दर्शाता है कि 21वीं सदी की कूटनीति स्थायी मित्रताओं पर नहीं, बल्कि लचीले और अवसरवादी हितों पर आधारित है। आज की वैश्विक राजनीति में भरोसा नहीं, बल्कि संतुलन और रणनीतिक चौकसी ही स्थायी तत्व हैं। अमेरिका की यह चाल केवल पाकिस्तान की परीक्षा नहीं है, बल्कि भारत की रणनीतिक सूझबूझ का भी इम्तिहान है।

श्रेया गुप्ता कल्ट करंट की प्रशिक्षु पत्रकार है। आलेख में व्यक्त विचार उनके
निजी हैं और कल्ट करंट का इससे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।


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